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सुप्रीम लड़ाई जीते, सरकार से हारे

शिमला शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में तो कानूनी लड़ाई जीत ली पर सरकार के आगे हार गए हैं। मामला पूर्व सैनिकों के वरिष्ठता लाभों से जुड़ा है। हिमाचल प्रदेश में पूर्व सैनिकों के लिए सिविल सर्विसिस में 15 फीसद नौकरी कोटा तय है। सुप्रीम कोर्ट ने सेवानिवृत्ति के बाद सिविल में नौकरी मिलने पर सेना के सेवाकाल की वरिष्ठता
(सीनियोरिटी) खत्म कर दी है। लेकिन प्रदेश सरकार सुप्रीम फैसले को भी लागू नहीं कर रही है।
सरकार के रवैये से आहत स्कूल प्रवक्ता संघ ने प्रदेश हाईकोर्ट में तीन आइएएस अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला दायर किया है। इसमें तत्कालीन मुख्य सचिव विनीत चौधरी, कार्मिक सचिव रहीं पूर्णिमा चौहान व शिक्षा सचिव डॉ. अरुण शर्मा को व्यक्तिगत तौर पर पार्टी बनाया गया है। इससे इन तीनों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इनमें से विनीत चौधरी सेवानिवृत्त हो गए हैं लेकिन उन्हें भी कोर्ट की कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा। मामले की सुनवाई दो नवंबर को होगी। हिमाचल प्रदेश में पूर्व सैनिकों को सेना के सेवाकाल की वरिष्ठता नहीं मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में शिक्षक संघों की याचिका पर एक साल पहले 27 अगस्त को फैसला दिया था जो लागू नहीं हो रहा है। क्या कहा था कोर्ट ने

सुप्रीम कोर्ट नें डिमोबिलाइज्ड आ‌र्म्स फोर्स एक्ट 1972 के क्लॉज 5 (1) को खत्म कर दिया। कोर्ट ने इसे असंवैधनिक करार दिया। इसके मुताबिक सभी सरकारी विभागों में कार्यरत पूर्व सैनिकों की वरिष्ठता को दोबारा निर्धारित किया जाना था। शिक्षा विभाग ने इसे 29 दिसंबर से 2008 के बाद रिफ्रेम किया जबकि यह रूल्स के अस्तित्व में आने के बाद ही रिफ्रेम किया जाना था। सेना में सिपाही भर्ती बना सीनियर लेक्चरर
जो युवा दसवीं पास कर सेना में सिपाही भर्ती हुआ, उसने बाद में एमए भी कर ली। वह सेवानिवृत्ति के बाद शिक्षा विभाग में लेक्चरर तैनात हुआ तो उसे सेना के सेवाकाल की वरिष्ठता का भी लाभ मिला। इस कारण उससे पहले उच्च शिक्षा प्राप्त लेक्चरर उससे जूनियर हो गया। वह तीन साल के बाद ही प्रधानाचार्य भी पदोन्नत हुआ। वहीं, सीधी भर्ती से तैनात लेक्चरर 22 साल की नौकरी के बाद भी पदोन्नत नहीं हो रहे हैं। पहले हारे, फिर जीते
स्कूल प्रवक्ता संघ ने 1998 में पूर्व सैनिकों की वरिष्ठता को प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में चुनौती दी। लेकिन वहां शिक्षक हार गए। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई। वर्ष 2008 में शिक्षकों के हक में फैसला आया। इसके बाद पूर्व सैनिक इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट चले गए। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। तत्काल लागू हो फैसला

शिक्षकों ने 22 साल के लंबे अरसे बाद केस जीता। सुप्रीम कोर्ट तक गए। वहां से भी हक में फैसला आया लेकिन सरकार इसे सही तरीके से लागू नहीं कर रही है। ऐसे में सुनवाई कौन करेगा? सरकार इस फैसले को तत्काल लागू करे।
अजय नाग, प्रदेशाध्यक्ष, स्कूल प्रिंसिपल एवं निरीक्षक अधिकारी संघ सिविल में नहीं दी जा सकती सेना की वरिष्ठता
एसोसिएशन ने तीन आइएसएस अधिकारियों के खिलाफ हाईकोर्ट में अदालत की अवमानना का मामला दायर किया है। कोर्ट ने सरकार से पूरी रिपोर्ट तलब की है। सुनवाई अगले महीने होगी। सेना की वरिष्ठता सिविल में नहीं दी जा सकती है।
डॉ. अश्रि्वनी कुमार, पूर्व अध्यक्ष, स्कूल प्रवक्ता संघ लागू होगा कोर्ट का आदेश
अदालत की अवमानना का मामला मेरे ध्यान में नहीं है। अगर पूर्व सैनिकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश होगा तो उसे लागू किया जाएगा। कोर्ट का सम्मान करेंगे।

डॉ. अरुण शर्मा, शिक्षा सचिव

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